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Tuesday, October 28, 2008

हमारे शौक़ की ये इन्तिहा थी

हमारे शौक़ की ये इन्तिहा थी
क़दम रखा कि मंज़िल रास्ता थी

कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी

मोहब्बत मर गई मुझको भी ग़म है
मेरे अच्छे दिनों की आशना थी

जिसे छू लूँ मैं वो हो जाये सोना
तुझे देखा तो जाना बद्दुआ थी

मरीज़े-ख़्वाब को तो अब शफ़ा है
मगर दुनिया बड़ी कड़वी दवा थी


शफ़ा=आराम, रोग से मुक्ति

मुझको यक़ीं है

मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं 
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं 

इक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे रिश्ता तोड़ लिया 
इक वो दिन दिन जब पेड़ की शाख़े बोझ हमारा सहती थीं

इक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आँसू का 
इक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं 

इक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी रूठी लगती हैं 
इक वो दिन जब 'आओ खेलें' सारी गलियाँ कहती थीं

इक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं 
इक वो दिन जब शाख़ों की भी पलकें बोझल रहती थीं 

इक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी की बातें हैं 
इक वो दिन जब दिल में सारी भोली बातें रहती थीं 

इक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है 
इक वो घर जिसमें मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं 

तमन्‍ना फिर मचल जाए

तमन्‍ना फिर मचल जाए

अगर तुम मिलने आ जाओ।

यह मौसम ही बदल जाए

अगर तुम मिलने आ जाओ।

मुझे गम है कि मैने जिन्‍दगी में कुछ नहीं पाया

ये गम दिल से निकल जाए

अगर तुम मिलने आ जाओ।

नहीं मिलते हो मुझसे तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे

ज़माना मुझसे जल जाए

अगर तुम मिलने आ जाओ।

ये दुनिया भर के झगड़े घर के किस्‍से काम की बातें

बला हर एक टल जाए

अगर तुम मिलने आ जाओ।